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मुजरिम हो तुम मेरे प्यार के

 

नहाने गया था

उसकी झील सी आँखों में कूद गया

नहाने गया था

उसकी झील सी आँखों में कूद गया

मुझे तैरना नहीं आता

गहरी आँखों में डूब गया

वर्षों से उसके आँखों के पानी से अब मैं ऊब गया

..वर्षों से उसके आँखों के पानी से अब मैं ऊब गया

एक दिन मैंने उसके आँखों से निकलने की तरकीब सोची

एक दिन मैंने उसके आँखों से निकलने की तरकीब सोची

उसने काजल की लकीरों से अपनी आँखों पर लक्ष्मणरेखा खींची 

मैंने लक्ष्मणरेखा लाँघने की योजना बनाई

उसने चश्मे के ढक्कन से अपनी आँखें सजाई

अब मैं उसके चश्मे के ढक्कन से बाहर नहीं जा पा रहा हूँ।

उसके आँखों के दलदल में लिए जा रहा हूँ

एक दिन मैंने हिम्मत करके पूंछ ही लिया

क्या गुनाह किया मैंने जिसकी ये सजा देती हो ?

क्या गुनाह किया मैंने जिसकी ये सजा देती हो ?

क्यूँ इस बेचारे का मजा लेती हो ?

क्यूँ इस बेचारे का मजा लेती हो ?

जवाब मिला....

ये सजा है मुझसे प्यार करने की

मुझसे आँखें चार करने की

अब रहना है तुम्हें मेरी आँखों में

अब रहना है तुम्हें मेरी आँखों में

बस यही तुम्हारी ज़िंदगानी है

मुजरिम हो तुम मेरे प्यार के

ये मेरी आँखें ही तुम्हारे लिए सजा-ए-कालापानी हैं।



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