दीपक रूपी सामाजिक तिमिर का दीप्त पिंड....
मैंने पढ़ा एक व्यक्तिव जो एक समान्य व्यक्तिव नही है भारत की वह जातियां (भारतीय समाज) जो इस कालचक्र में अपने अस्तित्व को लगभग भूल चुकी हो और सभ्य और जागरूक जातियां धीरे धीरे काल के कु चक्र में फंसती फंसती भटक गई, अनभिज्ञ हुई समाजों में वापस प्रकाश या ऊर्जा की स्फूर्ति व जागरूकता फैला कर उनको आधुनिक युग से जोड़ कर और अपने अस्तित्व को बचाकर जो प्रकाश फैलाया है इस दीप्त पिंड रूपी वक्तित्व को पढ़ा उनके व्यक्तित्व को एक किताब में समेटा नही जा सकता हैं लेकिन उस प्रकाश को महसूस जरुर कर सकते हैं.....💯❤️🪔
~ K.L.Gurjar...

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें